Sunday, October 17, 2021

दूब - शमशेर बहादुर सिंह

 

 


मोटी, धुली लॉन की दूब,

       साफ मखमल की कालीन।

ठंडी धुली सुनहरी धूप।

 

हलकी मीठी चा-सा दिन,

मीठी चुस्‍की-सी बातें,

मुलायम बाँहों-सा अपनाव।

 

पलकों पर हौले-हौले

तुम्‍हारे फूल-से पाँव

      मानो भूल कर पड़ते

      हृदय के सपनों पर मेरे!

 

अकेला हूँ, आओ!

 

[1945]

 

कुछ कविताएँ (काव्य-संग्रह) – 1959 ई. में संग्रहीत


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