मोटी, धुली लॉन की दूब,
साफ मखमल की कालीन।
ठंडी धुली सुनहरी धूप।
हलकी मीठी चा-सा दिन,
मीठी चुस्की-सी बातें,
मुलायम बाँहों-सा अपनाव।
पलकों पर हौले-हौले
तुम्हारे फूल-से पाँव
मानो भूल कर पड़ते
हृदय के सपनों पर मेरे!
अकेला हूँ, आओ!
[1945]
कुछ कविताएँ (काव्य-संग्रह) – 1959 ई. में संग्रहीत
No comments:
Post a Comment