Tuesday, January 6, 2026

'टेंशन मत ले यार’ समकालीन शहरी युवाओं की मानसिकता, संघर्ष और सपनों का सजीव दस्तावेज़


पुस्तक : टेंशन मत ले यार (उपन्यास)
लेखक : दिव्य प्रकाश दुबे

दिव्य प्रकाश दुबे का उपन्यास ‘टेंशन मत ले यार’ समकालीन शहरी युवाओं की मानसिकता, संघर्ष और सपनों का सजीव दस्तावेज़ है। यह उपन्यास विशेष रूप से उस युवा वर्ग को केंद्र में रखता है जो महानगरों में पढ़ाई, नौकरी, प्रेम और आत्मपहचान के बीच निरंतर असमंजस और दबाव में जी रहा है।

उपन्यास का मूल कथ्य आज के युवाओं की टेंशन-ग्रस्त जीवनशैली पर आधारित है। “टेंशन मत ले यार” जैसे वाक्य हमारे दैनिक जीवन में सांत्वना के रूप में प्रयुक्त होते हैं, लेकिन उपन्यास यह दिखाता है कि यह वाक्य जितना सरल लगता है, वास्तविक जीवन में उतना ही कठिन है। पात्र आर्थिक असुरक्षा, करियर की अनिश्चितता, पारिवारिक अपेक्षाओं और भावनात्मक उलझनों से जूझते हैं।

दिव्य प्रकाश दुबे के पात्र आम पाठक को अपने जैसे लगते हैं—कॉलेज में पढ़ने वाले छात्र, शुरुआती नौकरी करने वाले युवा, प्रेम में पड़े लोग और अपने भविष्य को लेकर आशंकित मन। लेखक ने पात्रों को न तो असाधारण बनाया है और न ही आदर्शवादी; वे अपनी कमजोरियों और भ्रमों के साथ पूरी ईमानदारी से प्रस्तुत होते हैं। यही कारण है कि पाठक उनसे सहज रूप से जुड़ जाता है।

उपन्यास की भाषा इसकी सबसे बड़ी शक्ति है। सरल, बोलचाल की, शहरी हिंदी में लिखा गया यह उपन्यास पाठक से सीधा संवाद करता है। संवादों में हल्का व्यंग्य, हास्य और आत्मीयता है, जो गंभीर विषयों को भी बोझिल नहीं बनने देती। लेखक का शिल्प आधुनिक है और कथानक प्रवाहमय रहता है।

‘टेंशन मत ले यार’ केवल व्यक्तिगत समस्याओं की कथा नहीं है, बल्कि यह नव-उदारवादी समाज में पनप रही असुरक्षा, प्रतिस्पर्धा और अकेलेपन को भी रेखांकित करता है। उपन्यास यह संकेत देता है कि मुस्कुराते चेहरों के पीछे छिपी बेचैनी आज की पीढ़ी की साझा सच्चाई है।

कुल मिलाकर, ‘टेंशन मत ले यार’ एक ऐसा उपन्यास है जो आज के युवाओं की भाषा में, उनके ही अनुभवों को स्वर देता है। यह न कोई भारी-भरकम दर्शन प्रस्तुत करता है और न ही उपदेश देता है, बल्कि जीवन की सच्चाइयों को सहज ढंग से सामने रखता है। समकालीन हिंदी उपन्यासों में यह कृति अपनी संवेदनशीलता, सरलता और प्रासंगिकता के कारण विशेष स्थान रखती है।


-- आर. पी. शुक्ला



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