Saturday, June 27, 2026

डिबिया (लघुकथा संग्रह) : उदय प्रकाश

 किताब : डिबिया (लघुकथा संग्रह)

लेखक : उदय प्रकाश


समकालीन हिंदी साहित्य में ऐसे लेखक बहुत कम हैं जिनकी रचनाओं को निश्चिंत होकर पढ़ा जा सके और यह विश्वास बना रहे कि वे केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि पाठक को कुछ नया सोचने और समझने का अवसर भी देंगी। उदय प्रकाश ऐसे ही विरले रचनाकारों में हैं। उनकी कहानियों के प्रति मेरे मन में हमेशा विशेष उत्सुकता रही है, और इसी उत्सुकता ने मुझे डिबिया पढ़ने के लिए प्रेरित किया।


बारह लघुकथाओं से सुसज्जित इस संग्रह को मैंने एक ही बैठक में पढ़ लिया, जो मेरे जैसे धीमी गति से पढ़ने वाले के लिए अपने आप में सुखद और रोमांचक अनुभव था। संग्रह की प्रत्येक कहानी के साथ महेश वर्मा द्वारा बनाए गए चित्र कथाओं के वातावरण को और अधिक जीवंत बना देते हैं। ऐसा लगता है मानो कहानी के पात्र आँखों के सामने साकार हो उठे हों।


इस संग्रह की कहानियाँ केवल सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों पर तीखा व्यंग्य ही नहीं करतीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं से भरे ऐसे पात्र भी रचती हैं जो पाठक के मन पर गहरी छाप छोड़ जाते हैं। कई कहानियाँ पढ़ते-पढ़ते मन उदास हो उठता है और उनके भाव लंबे समय तक स्मृतियों में बने रहते हैं। 


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Friday, May 22, 2026

'संगत: विश्वनाथ त्रिपाठी' —वेद प्रकाश साक्षात्कार (Interview)

 





'संगत: विश्वनाथ त्रिपाठी' —वेद प्रकाश पुस्तक मूलतः साक्षात्कार (Interview) विधा की पुस्तक है।इस पुस्तक में वरिष्ठ साहित्यकार एवं आलोचक डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी के साथ किए गए विस्तृत संवाद, उनके जीवन के अनुभवों और साहित्यिक दृष्टिकोण का संकलन किया गया है।'

प्रकाशन वर्ष : 2026

विश्वनाथ त्रिपाठी की पुस्तक ‘संगत’ केवल एक किताब नहीं, बल्कि स्वयं त्रिपाठी जी के बहुआयामी व्यक्तित्व का जीवंत रूप है। यह कृति दिखाती है कि किस प्रकार एक व्यक्ति के भीतर पूरा संसार समाहित हो सकता है और उसकी सर्जनात्मक अभिव्यक्ति किस रूप में सामने आती है। पुस्तक में त्रिपाठी जी  अनेक आयामों में उपस्थित हैं, किंतु वे बिखरे हुए नहीं लगते, बल्कि ‘मिलिन्दप्रश्न’ के अविभाज्य रथ की भाँति एकात्म दिखाई देते हैं।

इसमें परिवार, साहित्य, कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, आलोचना, समाज, राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय दृष्टि, प्रकृति, संगीत और भोजन जैसे विविध पक्ष मिलकर एक विशिष्ट सांस्कृतिक रस का निर्माण करते हैं। यहाँ स्मृतियों की ऐसी दुनिया भी है जो समय और सीमाओं से परे जाती है, साथ ही वर्तमान जीवन की जटिलताओं और यथार्थ का सजीव चित्रण भी मिलता है।

पुस्तक पढ़ने के बाद यह अनुभव होता है कि त्रिपाठी जी का भावलोक मानवीय संवेदनाओं से निर्मित ऐसा संसार है, जहाँ जीवन और उसके सौंदर्य का सहज स्वीकार है। साथ ही सौंदर्य के भीतर छिपी पीड़ा की पहचान, मिथकों के गूढ़ अर्थों को उद्घाटित करने की क्षमता, विकसित होती नैतिक चेतना के प्रति प्रतिबद्धता तथा गंभीर विषयों को सहज संवाद के माध्यम से समझा देने की अद्भुत विशेषता भी इस कृति में दिखाई देती है।


•• आर. पी. शुक्ला

Thursday, May 7, 2026

नई कविता: हिंदी साहित्य का एक नया क्षितिज


1950 के दशक का साहित्यिक आंदोलन)

मुख्य कालक्रम एवं उत्पत्ति

नई कविता छठे दशक (1951-1960) की प्रमुख साहित्यिक धारा है। इसके आरंभ को लेकर दो प्रमुख मत प्रचलित हैं:

 1951 (दूसरा सप्तक):लक्ष्मीकांत वर्मा के अनुसार, अज्ञेय द्वारा संपादित 'दूसरा सप्तक' के प्रकाशन के साथ ही प्रयोगवाद का रूपांतरण 'नई कविता'में हो गया।

 1954 (नई कविता पत्रिका): डॉ. जगदीश गुप्त द्वारा संपादित पत्रिका 'नई कविता' के प्रकाशन से इस आंदोलन को विधिवत पहचान मिली।

प्रमुख नामकरण एवं श्रेय

 अज्ञेय: 1952 में सबसे पहले अपनी कविताओं को 'नई कविताएँ' कहकर संबोधित किया।

 शमशेर बहादुर सिंह: इन्होंने भी इसी कालखंड में अपनी रचनाओं के लिए 'नई कविता' शब्द का प्रयोग किया।

महत्वपूर्ण वैचारिक टिप्पणी

"नई कविता को प्रयोगवाद से अलग नहीं किया जा सकता; अंतर केवल यह है कि प्रयोगवाद में 'प्रयोगशीलता' केंद्र में है, जबकि नई कविता में 'प्रयोग' एक केंद्रीय प्रवृत्ति के रूप में नहीं दिखता।" — शंभूनाथ सिंह

विशेषताएं

 प्रयोगवाद का विकसित रूप: यह प्रयोगवाद की सीमाओं को विस्तार देती है।

 लघु मानव की प्रतिष्ठा: सामान्य जन के जीवन और अनुभूतियों को प्रमुखता।

 यथार्थवादी दृष्टि: जीवन के हर पक्ष (सुख-दुःख) का तटस्थ चित्रण।


--- आर. पी. शुक्ला


Tuesday, January 6, 2026

'दण्ड प्रहार' : सभ्यताओं के संघर्ष से उपजी एक नित्य कथा

पुस्तक : 'दण्ड प्रहार' : सभ्यताओं के संघर्ष से उपजी एक नित्य कथा  (उपन्यास)
लेखक : भगवानदास मोरवाल

भगवानदास मोरवाल का उपन्यास दण्ड प्रहार हिन्दी कथा-साहित्य में उनके सतत रचनात्मक हस्तक्षेप की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है। यह उनका बारहवाँ उपन्यास होते हुए भी किसी पारम्परिक कथानक या सीमित कथा-वृत्त में बँधा हुआ नहीं है। वस्तुतः यह 1925 में अस्तित्व में आए एक ऐसे संगठन की वैचारिक और व्यावहारिक गतिविधियों का साहित्यिक प्रतिफलन है, जो हिन्दुत्व, संस्कृति और राष्ट्रवाद की आड़ में गढ़ी गई कहानियों को निरन्तर प्रसारित करता रहा है—कहानियाँ, जिनका बहुलतावादी और समावेशी भारतीय समाज से कोई वास्तविक संवाद नहीं बनता।

यह उपन्यास उन ऐतिहासिक नायकों की छवियों पर पड़ते दुष्प्रभावों को भी सामने लाता है, जिन्होंने देश को औपनिवेशिक दासता से मुक्त कराने में निर्णायक भूमिका निभाई थी। आज उनके योगदान को संदिग्ध बनाने और उन्हें एक विशेष वैचारिक चश्मे से देखने की जो कोशिशें की जा रही हैं, दण्ड प्रहार उनका कठोर और निर्विकार आख्यान प्रस्तुत करता है। यह रचना किसी संगठन का इतिहास लिखने का दावा नहीं करती, बल्कि उस मानसिक संरचना को उजागर करती है, जो ‘हिन्दू राष्ट्र’ के नाम पर ऐसे स्वप्न रचती है, जिनकी सामाजिक और ऐतिहासिक यथार्थ में परिणति असंभव दिखाई देती है।

दण्ड प्रहार एक ऐसे स्वयंभू सांस्कृतिक संगठन की रोज़मर्रा की कार्यशैली और उसके दीर्घकालिक प्रभावों का लेखा-जोखा है, जिसने बीते सौ वर्षों में भारतीय लोकचेतना और सांस्कृतिक विविधता को गम्भीर रूप से प्रभावित किया है। उपन्यास भारतीय उपमहाद्वीप में लगातार गहराते सांस्कृतिक विभाजन, बढ़ती असहिष्णुता और आपसी टकराव की प्रवृत्तियों का सूक्ष्म विश्लेषण करता है। विशेष रूप से पिछले पाँच दशकों में धर्म, जाति और इतिहास को संदेह के घेरे में खड़ा करने की जो प्रक्रिया तेज़ हुई है, उसके संदर्भ में यह कृति पाठक को सोचने और ठहरकर विचार करने की ज़मीन देती है।

यह उपन्यास उन बुनियादी प्रश्नों से बार-बार टकराता है, जिनसे किसी भी समाज का भविष्य तय होता है—क्या समाज के मूल प्रश्न वैचारिक और आर्थिक सरोकारों से निर्धारित होने चाहिए, या फिर धार्मिक और सांस्कृतिक संघर्षों से जन्मे मतभेदों से? भारत जैसे देश, जहाँ विविध सामाजिक-सांस्कृतिक विश्वासों के बावजूद एक साझा विरासत और सामूहिक विवेक की परम्परा रही है, वहाँ ये प्रश्न और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। उपन्यास संकेत करता है कि इन प्रश्नों के उत्तर सतही राजनीतिक बहसों में नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना में निहित हैं।

यह भी मात्र संयोग नहीं है कि एक ओर देश गम्भीर आन्तरिक चुनौतियों और तनावों से गुजर रहा है, वहीं दूसरी ओर एक संगठन अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूरे होने का उत्सव मना रहा है। इस विरोधाभास के बीच समाज का एक बड़ा हिस्सा किसी अनकहे और अनदेखे भय से ग्रस्त दिखाई देता है। दण्ड प्रहार उसी भय, उसी सहमेपन के कारणों को तलाशने वाला उपन्यास है। इसी कारण यह कृति न केवल साहित्यिक स्तर पर, बल्कि समकालीन सामाजिक विमर्श के रूप में भी विशेष महत्त्व रखती है।


-- आर. पी. शुक्ला 

'टेंशन मत ले यार’ समकालीन शहरी युवाओं की मानसिकता, संघर्ष और सपनों का सजीव दस्तावेज़


पुस्तक : टेंशन मत ले यार (उपन्यास)
लेखक : दिव्य प्रकाश दुबे

दिव्य प्रकाश दुबे का उपन्यास ‘टेंशन मत ले यार’ समकालीन शहरी युवाओं की मानसिकता, संघर्ष और सपनों का सजीव दस्तावेज़ है। यह उपन्यास विशेष रूप से उस युवा वर्ग को केंद्र में रखता है जो महानगरों में पढ़ाई, नौकरी, प्रेम और आत्मपहचान के बीच निरंतर असमंजस और दबाव में जी रहा है।

उपन्यास का मूल कथ्य आज के युवाओं की टेंशन-ग्रस्त जीवनशैली पर आधारित है। “टेंशन मत ले यार” जैसे वाक्य हमारे दैनिक जीवन में सांत्वना के रूप में प्रयुक्त होते हैं, लेकिन उपन्यास यह दिखाता है कि यह वाक्य जितना सरल लगता है, वास्तविक जीवन में उतना ही कठिन है। पात्र आर्थिक असुरक्षा, करियर की अनिश्चितता, पारिवारिक अपेक्षाओं और भावनात्मक उलझनों से जूझते हैं।

दिव्य प्रकाश दुबे के पात्र आम पाठक को अपने जैसे लगते हैं—कॉलेज में पढ़ने वाले छात्र, शुरुआती नौकरी करने वाले युवा, प्रेम में पड़े लोग और अपने भविष्य को लेकर आशंकित मन। लेखक ने पात्रों को न तो असाधारण बनाया है और न ही आदर्शवादी; वे अपनी कमजोरियों और भ्रमों के साथ पूरी ईमानदारी से प्रस्तुत होते हैं। यही कारण है कि पाठक उनसे सहज रूप से जुड़ जाता है।

उपन्यास की भाषा इसकी सबसे बड़ी शक्ति है। सरल, बोलचाल की, शहरी हिंदी में लिखा गया यह उपन्यास पाठक से सीधा संवाद करता है। संवादों में हल्का व्यंग्य, हास्य और आत्मीयता है, जो गंभीर विषयों को भी बोझिल नहीं बनने देती। लेखक का शिल्प आधुनिक है और कथानक प्रवाहमय रहता है।

‘टेंशन मत ले यार’ केवल व्यक्तिगत समस्याओं की कथा नहीं है, बल्कि यह नव-उदारवादी समाज में पनप रही असुरक्षा, प्रतिस्पर्धा और अकेलेपन को भी रेखांकित करता है। उपन्यास यह संकेत देता है कि मुस्कुराते चेहरों के पीछे छिपी बेचैनी आज की पीढ़ी की साझा सच्चाई है।

कुल मिलाकर, ‘टेंशन मत ले यार’ एक ऐसा उपन्यास है जो आज के युवाओं की भाषा में, उनके ही अनुभवों को स्वर देता है। यह न कोई भारी-भरकम दर्शन प्रस्तुत करता है और न ही उपदेश देता है, बल्कि जीवन की सच्चाइयों को सहज ढंग से सामने रखता है। समकालीन हिंदी उपन्यासों में यह कृति अपनी संवेदनशीलता, सरलता और प्रासंगिकता के कारण विशेष स्थान रखती है।


-- आर. पी. शुक्ला



Sunday, January 4, 2026

उज्ज्वल कुमार सिंह का उपन्यास ‘वर्क लोड’: दफ्तरशाही की विडंबनाओं का व्यंग्यात्मक दस्तावेज़


पुस्तक : वर्कलोड : काम कम, लोड ज़्यादा (उपन्यास)
लेखक : उज्ज्वल कुमार सिंह

 उज्ज्वल कुमार सिंह का उपन्यास ‘वर्क लोड’ समकालीन कार्यालयी संस्कृति की उस विडंबना को उजागर करता है, जहाँ कार्य की वास्तविकता से अधिक उसका प्रदर्शन महत्त्वपूर्ण हो गया है। यह रचना आधुनिक दफ्तरों में व्याप्त उस मानसिकता का सजीव चित्र प्रस्तुत करती है, जिसमें व्यस्तता एक मुखौटा बन जाती है और काम औपचारिकता में सिमट जाता है।

उपन्यास में रचे गए पात्र—सिंह साहब, शुक्ला जी और मिश्राजी—दफ्तर की विविध प्रवृत्तियों और मनोवृत्तियों के प्रतिनिधि हैं। ये पात्र व्यक्तिगत सीमाओं से आगे बढ़कर पूरी व्यवस्था के प्रतीक बन जाते हैं। लेखक इनके माध्यम से यह दिखाने में सफल होते हैं कि किस प्रकार मीटिंग, रिपोर्ट, फाइलें और दिखावटी सक्रियता वास्तविक श्रम और सृजनशीलता को हाशिये पर धकेल देती हैं।

भाषा की दृष्टि से यह उपन्यास विशेष रूप से उल्लेखनीय है। सरल, सहज और प्रवाहपूर्ण भाषा में लेखक ने गहरे सामाजिक यथार्थ को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया है। हास्य और व्यंग्य यहाँ केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समकालीन कार्य-संस्कृति की आलोचना का सशक्त माध्यम बनते हैं। रचना पाठक को हँसाते हुए आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करती है—कि क्या हम स्वयं भी इस “काम कम, वर्क लोड अधिक” वाली संस्कृति का हिस्सा नहीं बन चुके हैं।

समग्र रूप से ‘वर्क लोड’ दफ्तरशाही के आंतरिक संसार को सूक्ष्म दृष्टि, सामाजिक समझ और व्यंग्यात्मक संवेदना के साथ प्रस्तुत करने वाला एक विचारोत्तेजक उपन्यास है। यह तथ्य विशेष महत्त्व रखता है कि इसके लेखक उज्ज्वल कुमार सिंह एक नवोदित साहित्य–विद्यार्थी हैं। उनकी यह कृति भविष्य में एक संवेदनशील और समर्थ रचनाकार के रूप में उनकी संभावनाओं को रेखांकित करती है। ऐसे रचनाकारों को साहित्यिक समाज से निरंतर प्रोत्साहन और मार्गदर्शन मिलना आवश्यक है।

-- आर. पी. शुक्ला

Wednesday, December 31, 2025

निर्मल वर्मा के उपन्यास ‘अंतिम अरण्य’ की समीक्षा

 




निर्मल वर्मा का उपन्यास ‘अंतिम अरण्य’ उनके समूचे रचनात्मक संसार की संवेदनात्मक विरासत को समेटने वाला महत्त्वपूर्ण कथ्य है। यह किसी सीधे-सादे कथानक का उपन्यास नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर घटने वाली सूक्ष्म हलचलों, स्मृति और अकेलेपन, क्षरण और पुनर्स्मरण, तथा अस्तित्वगत प्रश्नों के गहरे अनुभव का साहित्यिक दस्तावेज़ है। इसीलिए इसे पढ़ते हुए लगता है कि हम बाहरी घटनाओं से ज्यादा एक आत्मिक यात्रा में शामिल हैं।


उपन्यास का परिवेश हिमालयी अंचल से जुड़ा है—ऐसा स्थान जहाँ प्रकृति की निर्जनता और शांति मनुष्य के भीतर के खालीपन को और स्पष्ट कर देती है। यह “अरण्य” केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि मनुष्य की भीतरी दुनिया का प्रतीक है—एक ऐसा मानसिक वन, जहाँ स्मृतियाँ, पछतावे, प्रेम, अपराधबोध और असुरक्षाएँ एक साथ भटकती हैं। पात्र कहीं न कहीं अपनी-अपनी टूटनों के साथ खड़े हैं। उनके भीतर का विघटन ही असल कथा है।


उपन्यास का मूल स्वर अस्तित्व-बोध, अकेलापन और आत्म-सम्बोधन का है। निर्मल वर्मा यह दिखाते हैं कि आधुनिक जीवन में मनुष्य सिर्फ सामाजिक संघर्षों से नहीं, बल्कि अपने भीतर के अनुत्तरित प्रश्नों से भी जूझ रहा होता है। प्रेम यहाँ ठोस सम्बन्ध नहीं, बल्कि एक संवेदनात्मक स्मृति है; रिश्ते औपचारिक ढाँचे से ज्यादा मानसिक अनुभव हैं। “अंतिम अरण्य” इस अर्थ में आत्म-व्यथा का, लेकिन साथ ही आत्म-साक्षात्कार का भी आख्यान है।


निर्मल वर्मा का शिल्प यहाँ भी बेहद सूक्ष्म और काव्यात्मक है। भाषा धीमी, शांत और लगभग फुसफुसाहट जैसी है। वाक्य लंबे होते हुए भी बोझिल नहीं, बल्कि विचारों के बहाव जैसे लगते हैं। वे बाहरी घटनाओं की जगह मनोवैज्ञानिक बिम्बों और स्थितियों के माध्यम से कथा रचते हैं। संवाद कम हैं, आत्मकथ्य और चुप्पियाँ अधिक हैं। यही चुप्पी उपन्यास के अर्थ रचती है।


“अरण्य” स्वयं एक बड़ा प्रतीक है—अंतिम शरण, अंतिम निर्वासन और अंतिम आत्म-संघर्ष का। प्रकृति के दृश्य केवल साज-सज्जा नहीं, बल्कि पात्रों की मानसिक स्थितियों के प्रतिबिम्ब हैं। निर्मल वर्मा प्रतीकवाद का प्रयोग इस तरह करते हैं कि वह दार्शनिक लगते हुए भी भावनात्मक छूअन बनाए रखता है।


निर्मल वर्मा की रचनाओं में आंतरिक विखंडन, एकाकी मन, और संवेदनात्मक अनिश्चितता बार-बार लौटते विषय हैं। ‘अंतिम अरण्य’ इन प्रवृत्तियों का परिष्कृत रूप है। यह उपन्यास हिंदी साहित्य में उस परम्परा का हिस्सा है जहाँ कथा के बहाने मनुष्य के अस्तित्व का प्रश्न उठाया जाता है—ठोस उत्तर दिए बिना, लेकिन गहरी अनुभूति जगाते हुए।


‘अंतिम अरण्य’ उन पाठकों के लिए है जो साहित्य में केवल कहानी नहीं, बल्कि अनुभव, वातावरण और चिंतन तलाशते हैं। यह उपन्यास पाठक से धैर्य मांगता है, और बदले में उसे एक गहरी, संवेदनात्मक यात्रा देता है। यह मनुष्य के अकेलेपन, उसके स्मृति-क्षेत्र और उसकी अंत:संघर्षपूर्ण आत्मा की ऐसी संवेदनशील प्रस्तुति है, जो हिंदी उपन्यास परम्परा में निर्मल वर्मा की विशिष्ट पहचान को और गहरा करती है।


 --- आर. पी. शुक्ला

डिबिया (लघुकथा संग्रह) : उदय प्रकाश

 किताब : डिबिया (लघुकथा संग्रह) लेखक : उदय प्रकाश समकालीन हिंदी साहित्य में ऐसे लेखक बहुत कम हैं जिनकी रचनाओं को निश्चिंत होकर पढ़ा जा सके औ...