लेखक : उज्ज्वल कुमार सिंह
उज्ज्वल कुमार सिंह का उपन्यास ‘वर्क लोड’ समकालीन कार्यालयी संस्कृति की उस विडंबना को उजागर करता है, जहाँ कार्य की वास्तविकता से अधिक उसका प्रदर्शन महत्त्वपूर्ण हो गया है। यह रचना आधुनिक दफ्तरों में व्याप्त उस मानसिकता का सजीव चित्र प्रस्तुत करती है, जिसमें व्यस्तता एक मुखौटा बन जाती है और काम औपचारिकता में सिमट जाता है।
उपन्यास में रचे गए पात्र—सिंह साहब, शुक्ला जी और मिश्राजी—दफ्तर की विविध प्रवृत्तियों और मनोवृत्तियों के प्रतिनिधि हैं। ये पात्र व्यक्तिगत सीमाओं से आगे बढ़कर पूरी व्यवस्था के प्रतीक बन जाते हैं। लेखक इनके माध्यम से यह दिखाने में सफल होते हैं कि किस प्रकार मीटिंग, रिपोर्ट, फाइलें और दिखावटी सक्रियता वास्तविक श्रम और सृजनशीलता को हाशिये पर धकेल देती हैं।
भाषा की दृष्टि से यह उपन्यास विशेष रूप से उल्लेखनीय है। सरल, सहज और प्रवाहपूर्ण भाषा में लेखक ने गहरे सामाजिक यथार्थ को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया है। हास्य और व्यंग्य यहाँ केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समकालीन कार्य-संस्कृति की आलोचना का सशक्त माध्यम बनते हैं। रचना पाठक को हँसाते हुए आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करती है—कि क्या हम स्वयं भी इस “काम कम, वर्क लोड अधिक” वाली संस्कृति का हिस्सा नहीं बन चुके हैं।
समग्र रूप से ‘वर्क लोड’ दफ्तरशाही के आंतरिक संसार को सूक्ष्म दृष्टि, सामाजिक समझ और व्यंग्यात्मक संवेदना के साथ प्रस्तुत करने वाला एक विचारोत्तेजक उपन्यास है। यह तथ्य विशेष महत्त्व रखता है कि इसके लेखक उज्ज्वल कुमार सिंह एक नवोदित साहित्य–विद्यार्थी हैं। उनकी यह कृति भविष्य में एक संवेदनशील और समर्थ रचनाकार के रूप में उनकी संभावनाओं को रेखांकित करती है। ऐसे रचनाकारों को साहित्यिक समाज से निरंतर प्रोत्साहन और मार्गदर्शन मिलना आवश्यक है।
-- आर. पी. शुक्ला

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