Sunday, October 17, 2021

निराला के प्रति / शमशेर बहादुर सिंह

 

 

भूलकर जब राह- जब-जब राह...भटका मैं

तुम्हीं झलके, हे महाकवि,

सघन तम की आंख बन मेरे लिए,

अकल क्रोधित प्रकृति का विश्वास बन मेरे लिये-

जगत के उन्माद का

परिचय लिए,-

और आगत-प्राण का संचय लिए, झलके प्रमन तुम,

हे महाकवि! सहजतम लघु एक जीवन में

अखिल का परिणय लिए-

प्राणमय संचार करते शक्ति औ' छवि के मिलन का हास मंगलमय;

मधुर आठों याम

विसुध खुलते

कंठस्वर में तुम्हारे, कवि,

एक ऋतुओं के विहंसते सूर्य!

काल में (तम घोर)-

बरसाते प्रवाहित रस अथोर अथाह!

छू, किया करते

आधुनिकतम दाह मानव का

साधना स्वर से

शांत-शीतलतम ।

 

हाँ, तुम्हीं हो, एक मेरे कवि :

जानता क्या मैं-

हृदय में भरकर तुम्हारी साँस-

किस तरह गाता,

(ओ विभूति परंपरा की!)

समझ भी पाता तुम्हें यदि मैं कि जितना चाहता हूँ,

महाकवि मेरे !

 

 

(1939 में विरचित,'कुछ कविताएँ' नामक कविता-संग्रह से)

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