Wednesday, December 31, 2025

निर्मल वर्मा के उपन्यास ‘अंतिम अरण्य’ की समीक्षा

 




निर्मल वर्मा का उपन्यास ‘अंतिम अरण्य’ उनके समूचे रचनात्मक संसार की संवेदनात्मक विरासत को समेटने वाला महत्त्वपूर्ण कथ्य है। यह किसी सीधे-सादे कथानक का उपन्यास नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर घटने वाली सूक्ष्म हलचलों, स्मृति और अकेलेपन, क्षरण और पुनर्स्मरण, तथा अस्तित्वगत प्रश्नों के गहरे अनुभव का साहित्यिक दस्तावेज़ है। इसीलिए इसे पढ़ते हुए लगता है कि हम बाहरी घटनाओं से ज्यादा एक आत्मिक यात्रा में शामिल हैं।


उपन्यास का परिवेश हिमालयी अंचल से जुड़ा है—ऐसा स्थान जहाँ प्रकृति की निर्जनता और शांति मनुष्य के भीतर के खालीपन को और स्पष्ट कर देती है। यह “अरण्य” केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि मनुष्य की भीतरी दुनिया का प्रतीक है—एक ऐसा मानसिक वन, जहाँ स्मृतियाँ, पछतावे, प्रेम, अपराधबोध और असुरक्षाएँ एक साथ भटकती हैं। पात्र कहीं न कहीं अपनी-अपनी टूटनों के साथ खड़े हैं। उनके भीतर का विघटन ही असल कथा है।


उपन्यास का मूल स्वर अस्तित्व-बोध, अकेलापन और आत्म-सम्बोधन का है। निर्मल वर्मा यह दिखाते हैं कि आधुनिक जीवन में मनुष्य सिर्फ सामाजिक संघर्षों से नहीं, बल्कि अपने भीतर के अनुत्तरित प्रश्नों से भी जूझ रहा होता है। प्रेम यहाँ ठोस सम्बन्ध नहीं, बल्कि एक संवेदनात्मक स्मृति है; रिश्ते औपचारिक ढाँचे से ज्यादा मानसिक अनुभव हैं। “अंतिम अरण्य” इस अर्थ में आत्म-व्यथा का, लेकिन साथ ही आत्म-साक्षात्कार का भी आख्यान है।


निर्मल वर्मा का शिल्प यहाँ भी बेहद सूक्ष्म और काव्यात्मक है। भाषा धीमी, शांत और लगभग फुसफुसाहट जैसी है। वाक्य लंबे होते हुए भी बोझिल नहीं, बल्कि विचारों के बहाव जैसे लगते हैं। वे बाहरी घटनाओं की जगह मनोवैज्ञानिक बिम्बों और स्थितियों के माध्यम से कथा रचते हैं। संवाद कम हैं, आत्मकथ्य और चुप्पियाँ अधिक हैं। यही चुप्पी उपन्यास के अर्थ रचती है।


“अरण्य” स्वयं एक बड़ा प्रतीक है—अंतिम शरण, अंतिम निर्वासन और अंतिम आत्म-संघर्ष का। प्रकृति के दृश्य केवल साज-सज्जा नहीं, बल्कि पात्रों की मानसिक स्थितियों के प्रतिबिम्ब हैं। निर्मल वर्मा प्रतीकवाद का प्रयोग इस तरह करते हैं कि वह दार्शनिक लगते हुए भी भावनात्मक छूअन बनाए रखता है।


निर्मल वर्मा की रचनाओं में आंतरिक विखंडन, एकाकी मन, और संवेदनात्मक अनिश्चितता बार-बार लौटते विषय हैं। ‘अंतिम अरण्य’ इन प्रवृत्तियों का परिष्कृत रूप है। यह उपन्यास हिंदी साहित्य में उस परम्परा का हिस्सा है जहाँ कथा के बहाने मनुष्य के अस्तित्व का प्रश्न उठाया जाता है—ठोस उत्तर दिए बिना, लेकिन गहरी अनुभूति जगाते हुए।


‘अंतिम अरण्य’ उन पाठकों के लिए है जो साहित्य में केवल कहानी नहीं, बल्कि अनुभव, वातावरण और चिंतन तलाशते हैं। यह उपन्यास पाठक से धैर्य मांगता है, और बदले में उसे एक गहरी, संवेदनात्मक यात्रा देता है। यह मनुष्य के अकेलेपन, उसके स्मृति-क्षेत्र और उसकी अंत:संघर्षपूर्ण आत्मा की ऐसी संवेदनशील प्रस्तुति है, जो हिंदी उपन्यास परम्परा में निर्मल वर्मा की विशिष्ट पहचान को और गहरा करती है।


 --- आर. पी. शुक्ला

2 comments:

  1. इस जीवन अरण्य में हर कोई अकेला है
    भीतर सबके केवल अहसासो का मेला है

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  2. जी। प्रायः यही देखने को मिलता है।

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