Sunday, October 17, 2021

एक पीली शाम / शमशेर बहादुर सिंह

 



  शमशेर बहादुर सिंह »

एक पीली शाम

      पतझर का जरा अटका हुआ पत्ता

शान्त

मेरी भावनाओं में तुम्‍हारा मुखकमल

कृश म्‍लान हारा-सा

     (कि मैं हूँ वह

मौन दर्पण में तुम्‍हारे कहीं?)

 

     वासना डूबी

     शिथिल पल में

     स्‍नेह काजल में

     लिये अद्भुत रूप-कोमलता

 

अब गिरा अब गिरा वह अटका हुआ आँसू

सान्‍ध्‍य तारक-सा

      अतल में।

 

[1953]

 

 

 

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