Tuesday, January 6, 2026

'दण्ड प्रहार' : सभ्यताओं के संघर्ष से उपजी एक नित्य कथा

पुस्तक : 'दण्ड प्रहार' : सभ्यताओं के संघर्ष से उपजी एक नित्य कथा  (उपन्यास)
लेखक : भगवानदास मोरवाल

भगवानदास मोरवाल का उपन्यास दण्ड प्रहार हिन्दी कथा-साहित्य में उनके सतत रचनात्मक हस्तक्षेप की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है। यह उनका बारहवाँ उपन्यास होते हुए भी किसी पारम्परिक कथानक या सीमित कथा-वृत्त में बँधा हुआ नहीं है। वस्तुतः यह 1925 में अस्तित्व में आए एक ऐसे संगठन की वैचारिक और व्यावहारिक गतिविधियों का साहित्यिक प्रतिफलन है, जो हिन्दुत्व, संस्कृति और राष्ट्रवाद की आड़ में गढ़ी गई कहानियों को निरन्तर प्रसारित करता रहा है—कहानियाँ, जिनका बहुलतावादी और समावेशी भारतीय समाज से कोई वास्तविक संवाद नहीं बनता।

यह उपन्यास उन ऐतिहासिक नायकों की छवियों पर पड़ते दुष्प्रभावों को भी सामने लाता है, जिन्होंने देश को औपनिवेशिक दासता से मुक्त कराने में निर्णायक भूमिका निभाई थी। आज उनके योगदान को संदिग्ध बनाने और उन्हें एक विशेष वैचारिक चश्मे से देखने की जो कोशिशें की जा रही हैं, दण्ड प्रहार उनका कठोर और निर्विकार आख्यान प्रस्तुत करता है। यह रचना किसी संगठन का इतिहास लिखने का दावा नहीं करती, बल्कि उस मानसिक संरचना को उजागर करती है, जो ‘हिन्दू राष्ट्र’ के नाम पर ऐसे स्वप्न रचती है, जिनकी सामाजिक और ऐतिहासिक यथार्थ में परिणति असंभव दिखाई देती है।

दण्ड प्रहार एक ऐसे स्वयंभू सांस्कृतिक संगठन की रोज़मर्रा की कार्यशैली और उसके दीर्घकालिक प्रभावों का लेखा-जोखा है, जिसने बीते सौ वर्षों में भारतीय लोकचेतना और सांस्कृतिक विविधता को गम्भीर रूप से प्रभावित किया है। उपन्यास भारतीय उपमहाद्वीप में लगातार गहराते सांस्कृतिक विभाजन, बढ़ती असहिष्णुता और आपसी टकराव की प्रवृत्तियों का सूक्ष्म विश्लेषण करता है। विशेष रूप से पिछले पाँच दशकों में धर्म, जाति और इतिहास को संदेह के घेरे में खड़ा करने की जो प्रक्रिया तेज़ हुई है, उसके संदर्भ में यह कृति पाठक को सोचने और ठहरकर विचार करने की ज़मीन देती है।

यह उपन्यास उन बुनियादी प्रश्नों से बार-बार टकराता है, जिनसे किसी भी समाज का भविष्य तय होता है—क्या समाज के मूल प्रश्न वैचारिक और आर्थिक सरोकारों से निर्धारित होने चाहिए, या फिर धार्मिक और सांस्कृतिक संघर्षों से जन्मे मतभेदों से? भारत जैसे देश, जहाँ विविध सामाजिक-सांस्कृतिक विश्वासों के बावजूद एक साझा विरासत और सामूहिक विवेक की परम्परा रही है, वहाँ ये प्रश्न और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। उपन्यास संकेत करता है कि इन प्रश्नों के उत्तर सतही राजनीतिक बहसों में नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना में निहित हैं।

यह भी मात्र संयोग नहीं है कि एक ओर देश गम्भीर आन्तरिक चुनौतियों और तनावों से गुजर रहा है, वहीं दूसरी ओर एक संगठन अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूरे होने का उत्सव मना रहा है। इस विरोधाभास के बीच समाज का एक बड़ा हिस्सा किसी अनकहे और अनदेखे भय से ग्रस्त दिखाई देता है। दण्ड प्रहार उसी भय, उसी सहमेपन के कारणों को तलाशने वाला उपन्यास है। इसी कारण यह कृति न केवल साहित्यिक स्तर पर, बल्कि समकालीन सामाजिक विमर्श के रूप में भी विशेष महत्त्व रखती है।


-- आर. पी. शुक्ला 

'टेंशन मत ले यार’ समकालीन शहरी युवाओं की मानसिकता, संघर्ष और सपनों का सजीव दस्तावेज़


पुस्तक : टेंशन मत ले यार (उपन्यास)
लेखक : दिव्य प्रकाश दुबे

दिव्य प्रकाश दुबे का उपन्यास ‘टेंशन मत ले यार’ समकालीन शहरी युवाओं की मानसिकता, संघर्ष और सपनों का सजीव दस्तावेज़ है। यह उपन्यास विशेष रूप से उस युवा वर्ग को केंद्र में रखता है जो महानगरों में पढ़ाई, नौकरी, प्रेम और आत्मपहचान के बीच निरंतर असमंजस और दबाव में जी रहा है।

उपन्यास का मूल कथ्य आज के युवाओं की टेंशन-ग्रस्त जीवनशैली पर आधारित है। “टेंशन मत ले यार” जैसे वाक्य हमारे दैनिक जीवन में सांत्वना के रूप में प्रयुक्त होते हैं, लेकिन उपन्यास यह दिखाता है कि यह वाक्य जितना सरल लगता है, वास्तविक जीवन में उतना ही कठिन है। पात्र आर्थिक असुरक्षा, करियर की अनिश्चितता, पारिवारिक अपेक्षाओं और भावनात्मक उलझनों से जूझते हैं।

दिव्य प्रकाश दुबे के पात्र आम पाठक को अपने जैसे लगते हैं—कॉलेज में पढ़ने वाले छात्र, शुरुआती नौकरी करने वाले युवा, प्रेम में पड़े लोग और अपने भविष्य को लेकर आशंकित मन। लेखक ने पात्रों को न तो असाधारण बनाया है और न ही आदर्शवादी; वे अपनी कमजोरियों और भ्रमों के साथ पूरी ईमानदारी से प्रस्तुत होते हैं। यही कारण है कि पाठक उनसे सहज रूप से जुड़ जाता है।

उपन्यास की भाषा इसकी सबसे बड़ी शक्ति है। सरल, बोलचाल की, शहरी हिंदी में लिखा गया यह उपन्यास पाठक से सीधा संवाद करता है। संवादों में हल्का व्यंग्य, हास्य और आत्मीयता है, जो गंभीर विषयों को भी बोझिल नहीं बनने देती। लेखक का शिल्प आधुनिक है और कथानक प्रवाहमय रहता है।

‘टेंशन मत ले यार’ केवल व्यक्तिगत समस्याओं की कथा नहीं है, बल्कि यह नव-उदारवादी समाज में पनप रही असुरक्षा, प्रतिस्पर्धा और अकेलेपन को भी रेखांकित करता है। उपन्यास यह संकेत देता है कि मुस्कुराते चेहरों के पीछे छिपी बेचैनी आज की पीढ़ी की साझा सच्चाई है।

कुल मिलाकर, ‘टेंशन मत ले यार’ एक ऐसा उपन्यास है जो आज के युवाओं की भाषा में, उनके ही अनुभवों को स्वर देता है। यह न कोई भारी-भरकम दर्शन प्रस्तुत करता है और न ही उपदेश देता है, बल्कि जीवन की सच्चाइयों को सहज ढंग से सामने रखता है। समकालीन हिंदी उपन्यासों में यह कृति अपनी संवेदनशीलता, सरलता और प्रासंगिकता के कारण विशेष स्थान रखती है।


-- आर. पी. शुक्ला



Sunday, January 4, 2026

उज्ज्वल कुमार सिंह का उपन्यास ‘वर्क लोड’: दफ्तरशाही की विडंबनाओं का व्यंग्यात्मक दस्तावेज़


पुस्तक : वर्कलोड : काम कम, लोड ज़्यादा (उपन्यास)
लेखक : उज्ज्वल कुमार सिंह

 उज्ज्वल कुमार सिंह का उपन्यास ‘वर्क लोड’ समकालीन कार्यालयी संस्कृति की उस विडंबना को उजागर करता है, जहाँ कार्य की वास्तविकता से अधिक उसका प्रदर्शन महत्त्वपूर्ण हो गया है। यह रचना आधुनिक दफ्तरों में व्याप्त उस मानसिकता का सजीव चित्र प्रस्तुत करती है, जिसमें व्यस्तता एक मुखौटा बन जाती है और काम औपचारिकता में सिमट जाता है।

उपन्यास में रचे गए पात्र—सिंह साहब, शुक्ला जी और मिश्राजी—दफ्तर की विविध प्रवृत्तियों और मनोवृत्तियों के प्रतिनिधि हैं। ये पात्र व्यक्तिगत सीमाओं से आगे बढ़कर पूरी व्यवस्था के प्रतीक बन जाते हैं। लेखक इनके माध्यम से यह दिखाने में सफल होते हैं कि किस प्रकार मीटिंग, रिपोर्ट, फाइलें और दिखावटी सक्रियता वास्तविक श्रम और सृजनशीलता को हाशिये पर धकेल देती हैं।

भाषा की दृष्टि से यह उपन्यास विशेष रूप से उल्लेखनीय है। सरल, सहज और प्रवाहपूर्ण भाषा में लेखक ने गहरे सामाजिक यथार्थ को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया है। हास्य और व्यंग्य यहाँ केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समकालीन कार्य-संस्कृति की आलोचना का सशक्त माध्यम बनते हैं। रचना पाठक को हँसाते हुए आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करती है—कि क्या हम स्वयं भी इस “काम कम, वर्क लोड अधिक” वाली संस्कृति का हिस्सा नहीं बन चुके हैं।

समग्र रूप से ‘वर्क लोड’ दफ्तरशाही के आंतरिक संसार को सूक्ष्म दृष्टि, सामाजिक समझ और व्यंग्यात्मक संवेदना के साथ प्रस्तुत करने वाला एक विचारोत्तेजक उपन्यास है। यह तथ्य विशेष महत्त्व रखता है कि इसके लेखक उज्ज्वल कुमार सिंह एक नवोदित साहित्य–विद्यार्थी हैं। उनकी यह कृति भविष्य में एक संवेदनशील और समर्थ रचनाकार के रूप में उनकी संभावनाओं को रेखांकित करती है। ऐसे रचनाकारों को साहित्यिक समाज से निरंतर प्रोत्साहन और मार्गदर्शन मिलना आवश्यक है।

-- आर. पी. शुक्ला

'दण्ड प्रहार' : सभ्यताओं के संघर्ष से उपजी एक नित्य कथा

पुस्तक : 'दण्ड प्रहार' : सभ्यताओं के संघर्ष से उपजी एक नित्य कथा  (उपन्यास) लेखक : भगवानदास मोरवाल भगवानदास मोरवाल का उपन्यास दण्ड प...